*सहकारिता सप्ताह के तहत जिले के तीनों विकासखंडों में आयोजित हुई किसान संगोष्ठी*
*जैविक खेती, फसल विविधीकरण एवं सॉइल हेल्थ कार्ड के उपयोग पर कृषि विशेषज्ञों ने किया मार्गदर्शन*
*सहकारिता के माध्यम से आधुनिक कृषि और किसानों की आय बढ़ाने पर दिया गया विशेष जोर*

मुकेश साहू ब्यूरो मुंगेली, / भारत सरकार के सहकारिता मंत्रालय की स्थापना के पाँच वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में 29 जून से 06 जुलाई 2026 तक देशभर में आयोजित किए जा रहे “सहकारिता सप्ताह” के अंतर्गत बुधवार को मुंगेली जिले के तीनों विकासखंडों में किसान संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कलेक्टर श्री कुन्दन कुमार के निर्देशन में आयोजित इस संगोष्ठी का उद्देश्य किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों, संतुलित उर्वरक उपयोग, जैविक खेती तथा फसल विविधीकरण के प्रति जागरूक करना रहा।
जिले के तीनों विकासखंडों में अलग-अलग सहकारी समितियों में आयोजित इस कार्यक्रम में जनप्रतिनिधियों, सहकारिता विभाग के अधिकारियों, कृषि वैज्ञानिकों, समिति प्रबंधकों तथा बड़ी संख्या में किसानों ने सहभागिता की। कार्यक्रम के दौरान किसानों को वैज्ञानिक खेती अपनाने तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के साथ उत्पादन एवं आय बढ़ाने के उपायों की विस्तृत जानकारी दी गई।
जिले में किसान संगोष्ठी का आयोजन विकासखंड मुंगेली के प्राथमिक कृषि साख सहकारी समिति चकरभाठा, विकासखंड लोरमी के प्राथमिक कृषि साख सहकारी समिति अखरार तथा विकासखंड पथरिया के प्राथमिक कृषि साख सहकारी समिति पथरिया में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। तीनों स्थानों पर किसानों ने उत्साहपूर्वक भाग लेकर कृषि विशेषज्ञों से सीधे संवाद किया तथा अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किया।
*मृदा स्वास्थ्य संरक्षण और संतुलित उर्वरक उपयोग पर विशेष बल*
संगोष्ठी में कृषि विशेषज्ञों ने कहा कि बेहतर उत्पादन के लिए खेत की मिट्टी का स्वस्थ होना सबसे महत्वपूर्ण है। किसानों को सलाह दी गई कि वे नियमित रूप से अपनी भूमि की मिट्टी की जांच कराएं तथा सॉइल हेल्थ कार्ड के अनुसार ही पोषक तत्वों एवं उर्वरकों का उपयोग करें। इससे उत्पादन लागत कम होगी, मिट्टी की उर्वरा शक्ति लंबे समय तक बनी रहेगी तथा फसल की गुणवत्ता में भी सुधार होगा।
विशेषज्ञों ने रासायनिक उर्वरकों विशेषकर डीएपी एवं यूरिया के अंधाधुंध उपयोग से बचने की अपील करते हुए आवश्यकता के अनुरूप संतुलित मात्रा में उर्वरकों के उपयोग की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वैज्ञानिक पद्धति अपनाने से उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण भी संभव है।
*जैविक खेती एवं फसल विविधीकरण अपनाने की अपील*
संगोष्ठी के दौरान किसानों को जैविक एवं प्राकृतिक खेती की उपयोगिता बताते हुए रसायनों पर निर्भरता कम करने के लिए प्रेरित किया गया। कृषि वैज्ञानिकों ने कहा कि जैविक खेती से मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर होती है, उत्पादन सुरक्षित रहता है तथा उपभोक्ताओं को भी गुणवत्तापूर्ण खाद्य सामग्री उपलब्ध होती है। इसके साथ ही किसानों को परंपरागत खेती के साथ फसल विविधीकरण अपनाने की सलाह दी गई। दलहन, तिलहन, उद्यानिकी एवं अन्य नगदी फसलों की खेती से कम पानी, कम लागत और अधिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है। विशेषज्ञों ने बताया कि बदलते मौसम और बाजार की मांग को देखते हुए विविध फसलों का उत्पादन किसानों की आय बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बन सकता है।
*सहकारिता से मजबूत होगी ग्रामीण अर्थव्यवस्था*
कार्यक्रम में उपस्थित जनप्रतिनिधियों एवं अतिथियों ने केंद्र एवं राज्य शासन की विभिन्न किसान हितैषी योजनाओं की जानकारी देते हुए कहा कि सहकारिता आंदोलन ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने का प्रभावी माध्यम है। सहकारी समितियों के माध्यम से किसानों को उर्वरक, बीज, ऋण, तकनीकी जानकारी एवं अन्य सुविधाएं सरलता से उपलब्ध हो रही हैं। उन्होंने कहा कि सहकारिता मंत्रालय के गठन के पाँच वर्षों में सहकारी संस्थाओं को डिजिटल एवं आधुनिक व्यवस्थाओं से जोड़ा गया है, जिससे किसानों को अधिक पारदर्शी और त्वरित सेवाएं मिल रही हैं।
कार्यक्रम के समापन अवसर पर उपस्थित किसानों ने उन्नत कृषि तकनीकों को अपनाने, जैविक खेती को बढ़ावा देने, मृदा स्वास्थ्य संरक्षण तथा वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों के माध्यम से अपनी खेती को अधिक लाभकारी बनाने का संकल्प लिया। विभागीय अधिकारियों एवं सहकारी समिति प्रबंधकों ने कार्यक्रम के सफल आयोजन में सहयोग देने वाले सभी जनप्रतिनिधियों, कृषि विशेषज्ञों एवं किसानों के प्रति आभार व्यक्त किया।
