पुस्तक समीक्षा- छत्तीसगढ़ी लोक साहित्य के संवाहक : दुर्गा प्रसाद पारकर के रचनात्मक अवदान लेखक – डॉ. गणेशराम कौशिक
समीक्षक – डुमन लाल ध्रुव

छत्तीसगढ़ की साहित्यिक धरती अनेक विद्वानों, लोक गायकों, कथाकारों और कवियों की कर्मभूमि रही है। इन्हीं में से एक प्रमुख नाम दुर्गा प्रसाद पारकर का है जिनका साहित्यिक अवदान छत्तीसगढ़ के लोक साहित्य, लोक भाषा और सांस्कृतिक चेतना को समर्पित रहा है।
डॉ. गणेशराम कौशिक द्वारा उनके व्यक्तित्व व कृतित्व पर केंद्रित विश्लेषणात्मक लेखन ने छत्तीसगढ़ी साहित्य में दुर्गा प्रसाद पारकर के स्थान को न केवल प्रतिष्ठित किया है, बल्कि उनकी साहित्यिक विरासत को एक सुव्यवस्थित विमर्श का आधार भी दिया है।
दुर्गा प्रसाद पारकर छत्तीसगढ़ के उन मनीषी साहित्यकारों में से हैं जिन्होंने जीवनभर लोक की भाषा में लोक के लिए लेखन किया। उनका जन्म ग्रामीण परिवेश में हुआ, और शिक्षा के साथ-साथ उन्होंने लोककला, परंपरा, कथा और संस्कृति को आत्मसात किया। वे शब्द के लोकशिल्पी हैं जिन्होंने छत्तीसगढ़ी भाषा को न केवल काव्यात्मक गरिमा दी, बल्कि उसे एक सशक्त माध्यम के रूप में सुस्पष्ट किया।
व्यक्तित्व और कृतित्व- डॉ. गणेशराम कौशिक द्वारा प्रस्तुत मूल्यांकन में पारकर जी का व्यक्तित्व एक सजग रचनाकार, संवेदनशील व्यक्तित्व, सामाजिक सरोकार से जुड़े जनकवि के रूप में उभरता है। वे निस्पृह, सादगीपूर्ण और लोकसंस्कृति के गहरे अध्येता हैं। उनका कृतित्व केवल मनोरंजन या भाषिक प्रयोग नहीं, बल्कि सामाजिक जागरण, सांस्कृतिक अस्मिता और जन चेतना का विस्तार है।
दुर्गा प्रसाद पारकर का साहित्य- पारकर जी ने कथा, कविता, लोकगीत, कहिनी , शिवनाथ ,सुकवा, चंदा,सोनचिरई जैसे सामाजिक नाटक तक में रचनात्मक उपस्थिति दर्ज की।
उनके लेखन में छत्तीसगढ़ी भाषा की सहजता, स्वाभाविकता और लालित्य देखने को मिलता है।
वे लोकभाषा के भीतर छुपे दर्शन को उजागर करते हैं।
डॉ. कौशिक के अनुसार, उनका साहित्य केवल मनोरंजन नहीं करता बल्कि प्रेरणा, विवेक और आत्ममूल्यांकन की दिशा देता है।
दुर्गा प्रसाद पारकर का पद्य साहित्य- उनकी कविताओं में लोक सौंदर्य और प्रकृति का चित्रण, नारी जीवन और श्रम की गरिमा, कृषक जीवन, पीड़ा और आशा, छत्तीसगढ़ की संस्कृति, पर्व-त्योहार और परंपरा सभी को भावनात्मक और कलात्मक रूप से उकेरा गया है। उनकी कविताओं में छत्तीसगढ़ की मिट्टी की गंध है, और छत्तीसगढ़ के जनमानस की धड़कन। डॉ. कौशिक ने इसे “जनसंस्कृति का जीवित काव्य” कहा है।
विश्लेषण- डॉ. गणेशराम कौशिक द्वारा प्रस्तुत विश्लेषण में स्पष्ट किया गया है कि- पारकर जी का साहित्य स्थानीय को वैश्विक विमर्श से जोड़ता है।
उन्होंने छत्तीसगढ़ी भाषा को केवल लोक की भाषा के रूप में नहीं, साहित्यिक भाषा के रूप में भी स्थापित किया।
उनकी रचनाएं छत्तीसगढ़ की सामाजिक परतों, वर्ग भेद, स्त्री विमर्श और श्रम संस्कृति को उजागर करती हैं।
विश्लेषण में यह भी बताया गया है कि उन्होंने अपने कविता-कर्म को सामाजिक दायित्व माना।
साहित्य पर प्रभाव और परिणाम- छत्तीसगढ़ी साहित्य में लोक की गरिमा को पुनर्स्थापित करने में उनका योगदान अद्वितीय है।
वे नवोदित लेखकों के लिए प्रेरणा स्रोत बने। उनके पद्य साहित्य ने छत्तीसगढ़ की नई पीढ़ी के रचनाकारों को लोक की ओर लौटने का संदेश दिया। उन्होंने भाषा को सजीव, सरस और संवेदनशील बनाया।
डॉ. कौशिक के अनुसार, पारकर जी ने जो साहित्यिक बीज बोए, वे आज छत्तीसगढ़ी साहित्य की हर शाखा में फले-फूले हैं। दुर्गा प्रसाद पारकर का साहित्य एक गाथा है – लोक, जन, श्रम, संस्कार और संवेदना की।
उनकी रचनाएं छत्तीसगढ़ की अस्मिता, आत्मा और आकांक्षाओं की जीवंत अभिव्यक्ति हैं।
डॉ. गणेशराम कौशिक ने अपने आलेख और विश्लेषण के माध्यम से पारकर जी को केवल एक कवि या लेखक नहीं, एक साहित्यिक परंपरा के वाहक के रूप में प्रस्तुत किया है।
दुर्गा प्रसाद पारकर का साहित्य हमें यह सिखाता है कि जो रचनाकार लोक के निकट होता है, वही शाश्वत होता है। उनकी साहित्यिक यात्रा और डॉ. कौशिक की विवेचना, दोनों मिलकर छत्तीसगढ़ी साहित्य को एक गहरे और समर्पित चिंतन से समृद्ध करती है।
समीक्षक – डुमन लाल ध्रुव
मुजगहन, धमतरी (छ.ग.)
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