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    पति-पत्नी एक दूसरे का शोषण करते रहते हैं।

    पति-पत्नी एक दूसरे का शोषण करते रहते हैं।

    पति – पत्नी एक दूसरे का शोषण करते रहते हैं

    सैकड़ों पति-पत्नियों को मैं जानता हूँ,

    लेकिन ऐसे पति-पत्नी को मैंने नहीं देखा,

    जो एक-दूसरे पर क्रोध में न हों ।

    उसका कारण है ।

    होना स्वाभाविक है ।

    क्योंकि जिस पर भी हम निर्भर होते हैं,

    उस पर क्रोध आता है ।

    जिस पर भी हम निर्भर होते हैं,

    वह मालिक मालूम पड़ता है,

    हम गुलाम हो गये ।

    और दोनों की यह प्रतीति है,

    क्योंकि दोनों ही निर्भर हैं ।

    मालिक कोई भी नहीं,

    दोनों गुलाम हैं ।

    और गुलाम की गुलामी,

    उस पर निर्भर रहना पड़ता है ।

    और निर्भरता का एक-दूसरे पर

    वे शोषण करते हैं ।

    अक्सर अगर घर में हो,

    पत्नी जीत जाती है –

    चाहे गलत हो,

    चाहे सही हो –

    क्योंकि पति उस पर निर्भर है

    कामवासना के लिए ।

    वह डरता है,

    व्यर्थ का विवाद खड़ा करो,

    वह कामवासना से इनक़ार कर देगी ।

    झँझट करो,

    तो प्रेम मिलना मुश्किल हो जायेगा ।

    और प्रेम चाहिए तो

    इतना सौदा करना पड़ता है ।

    इसलिए अक्सर पति हार जाता है ।

    और पत्नी जानती है ।

    इसलिए दो ही मौके पर पत्नियाँ

    उपद्रव खड़ा करती हैं –

    या तो पति भोजन कर रहा हो,

    या प्रेम करने की तैयारी कर रहा हो ।

    क्योंकि वही दो बातों पर वह निर्भर है ।

    उन्हीं दो बातों पर वह गुलाम है ।

    इसलिए पति भोजन की थाली पर बैठा कि

    पत्नी की शिकायतें शुरू हो जाती हैं ।

    उपद्रव शुरू हुआ ।

    और पति डरता है कि

    किसी तरह भोजन…

    तो हाँ – हूँ भरता है ।

    और ध्यान रहे,

    भोजन और कामवासना दोनों जुड़े हैं ।

    भोजन हमारे अस्तित्व के लिए ज़रूरी है,

    व्यक्ति के ;

    और कामवासना

    समाज के अस्तित्व के लिए ज़रूरी है ।

    कामवासना एक तरह का भोजन है,

    समाज का भोजन ।

    और वह व्यक्ति का भोजन है ।

    दोनों बातों पर पति निर्भर है ।

    इसलिए बड़े से बड़ा पति,

    चाहे वह नेपोलियन ही क्यों न हो,

    घर लौट कर दब्बू हो जाता है ।

    नेपोलियन भी जोसोफिन से ऐसा डरता है

    जैसे कोई भी पति अपनी पत्नी से डरता है ।

    वह सब बहादुरी,

    युद्ध का मैदान,

    वह सब खो जाता है ।

    क्योंकि यहाँ किसी पर निर्भर है ।

    कुछ जोसोफिन से चाहिए,

    जो कि वह इनक़ार कर सकती है ।

    वेश्याएँ ही अपने शरीर का सौदा करती हैं,

    ऐसा हम न सोचें ;

    पत्नियाँ भी करती हैं ।

    क्योंकि यह सौदा हुआ कि

    इतनी बातों के लिए राजी हो जाओ,

    तो शरीर मिल सकता है ;

    नहीं तो नहीं मिल सकता ।

    शरीर चाहिए,

    तो इतनी बातों के लिए राजी हो जाओ ।

    इसलिए क्रोध पति का पत्नी पर बना रहता है ।

    पत्नी का क्रोध पति पर बना रहता है ।

    क्योंकि वह भी निर्भर है इस पर ।

    जहाँ भी निर्भरता है,

    वहाँ क्रोध होगा,

    वहाँ प्रेम नहीं हो सकता ।

    प्रेम हम उसी दिन कर पायेंगे,

    जिस दिन हम निर्भर नहीं रहेंगे ।

    जिस दिन हम स्वावलम्बी हुए,

    प्रेम की दिशा में स्वावलम्बी हुए ।

    हम अकेले भी हो सकते हैं,

    और हमारे आनन्द में रत्ती भर फर्क नहीं पड़ेगा ।

    बस, उस दिन हम प्रेम कर सकेंगे और

    उसी दिन पत्नी हमारी हमें सताना बन्द करेगी ।

    क्योंकि अब वह जानती है कि

    अब सताने का कोई अर्थ नहीं रहा,

    अब झुकाने का कोई उपाय नहीं रहा,

    निर्भरता समाप्त हो गयी है ।

     

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