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    *आधुनिक साधनों के चलते पुरानी परंपराएं धीरे-धीरे विलुप्ति की ओर*

    *होली के पारंपरिक उल्लास को बनाए रखने के लिए लोगों को जागरूक करना जरूरी*

    तिजराम साहू ब्यूरो मुंगेली // आज के दौर में होली के पारंपरिक रंग-रूप में बदलाव साफ देखा जा सकता है। पहले जहां नगाड़ों की गूंज से गलियां और चौक-चौराहे गूंज उठते थे, वहीं अब डीजे और स्पीकर ने उनकी जगह ले ली है। तकनीक और आधुनिक साधनों के चलते पुरानी परंपराएं धीरे-धीरे विलुप्ति की ओर बढ़ रही हैं। इसके अलावा, मार्च-अप्रैल में होने वाली परीक्षाओं ने भी बच्चों और युवाओं के उत्साह को प्रभावित किया है। पहले जब परीक्षाएं फरवरी में हो जाती थीं, तब बच्चे बिना किसी दबाव के होली का आनंद लेते थे। लेकिन अब परीक्षा के तनाव के कारण वे खुलकर रंगों में नहीं डूब पाते। हालांकि, यह बदलाव सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से चिंताजनक है। पारंपरिक वाद्ययंत्रों को संरक्षित करने और होली के पारंपरिक उल्लास को बनाए रखने के लिए लोगों को जागरूक होना होगा। इसके लिए सांस्कृतिक कार्यक्रमों, स्कूलों और स्थानीय प्रशासन को पहल करनी चाहिए, जिससे आने वाली पीढ़ी हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी रहे।

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